सूरह अनफाल (8)

सूरह अनफाल
“Al-Anfal”

कहाँ नाज़िल हुई:मदीना
आयतें:75 verses
पारा:9-10

नाम रखने का कारण

सूरह की पहली ही आयत में शब्द ‘अनफाल’ का उल्लेख हुआ है, उसे ही सूरह का नाम दे दिया गया है। इस सूरह में अनफाल (युद्ध में जीता हुआ माल) के बारे में कुछ आदेश भी दिए गए हैं।

अवतरणकाल

यह सूरह बद्र के युद्ध के पश्चात् अवतरित हुई है और इसमें इस्लाम और कुफ्र के इस प्रथम युद्ध की विस्तृत समीक्षा की गई है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इससे पहले कि इस सूरह की समीक्षा की जाए, बद्र के युद्ध और उससे संबंधित परिस्थितियों पर एक ऐतिहासिक दृष्टि डाल लेनी चाहिए। 

नबी (सल्ल.) का आह्वान (मक्की काल के अंत तक) इस हैसियत से अपनी मज़बूती और दृढ़ता सिद्ध कर चुका था कि एक तरफ उसके पीछे एक उच्च सच्चरित्र, विशाल हृदय और विवेकशील ध्वजवाहक मौजूद था।

जिसकी कार्यप्रणाली से यह तथ्य पूर्ण रूप से स्पष्ट हो चुका था कि वह इस आह्वान को अत्यन्त सफलता की मंज़िल तक पहुंचाने के लिए अटल संकल्प किए हुए है।

दूसरी तरफ इस आह्वान और आमंत्रण में स्वयं एक ऐसा आकर्षण था कि वह दिलों और दिमागों में उतरता चला जा रहा था। लेकिन उस समय तक कुछ हैसियतों से इस आह्वान में बहुत कुछ कमी बाकी थी।

एक, यह कि यह बात अभी पूरी तरह सिद्ध नहीं हुई थी कि इसको ऐसे अनुयायियों की एक पर्याप्त संख्या प्राप्त हो चुकी है जो उसके लिए अपनी हर चीज़ न्यौछावर कर देने के लिए दुनिया भर से लड़ जाने के लिए, यहाँ तक कि अपने प्रियं रिश्तों-नातों को भी काट फेंकने के लिए तत्पर है।

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दूसरे, इस आह्वान की आवाज़ यद्यपि सारे देश में फैल गई थी, लेकिन इसके प्रभाव बिखरी हुई दशा में थे। इसको वह सामूहिक शक्ति प्राप्त नहीं हो सकी थी जो पुरानी जमी हुई अज्ञान-प्रणाली से निर्णायक मुकाबले के लिए ज़रूरी थी।

तीसरे, देश का कोई भू-भाग ऐसा नहीं था जहाँ यह आहूवान कदम जमाकर अपने अनुष्ठान को सुदृढ़ करता और फिर आगे बढ़ने का प्रयास करता। 

चौथे, उस समय तक इस आह्वान को व्यावहारिक जीवन के मामलों को अपने हाथ में लेकर चलाने का अवसर नहीं मिला था। इसलिए उन नैतिक सिद्धांतों का प्रदर्शन नहीं हो सका था। जिस पर यह आह्वान जीवन की पूरी व्यवस्था को स्थापित करना और चलाना चाहता था।

वार्ताएँ

यह है वह भव्यतापूर्ण युद्ध जिसकी कुरआन की इस सूरह में समीक्षा की गई है किन्तु इस समीक्षा की शैली उन सभी समीक्षाओं से भिन्न है जो संसार के सम्राट अपनी सेना की विजय के बाद किया करते हैं।

इसमें सबसे पहले उन कमजोरियों को रेखांकित किया गया है जो नैतिकता की हैसियत से अभी मुसलमानों में बाकी थी, ताकि आगे वे अपनी और अधिक पूर्णता के लिए प्रयास करें।

फिर उनको बताया गया कि इस विजय में अल्लाह की सहायता का कितना बड़ा भाग या ताकि वे अपने साहस और वीरता पर न फूलें, बल्कि अल्लाह पर भरोसा और अल्लाह और रसूल के आदेशानुपालन की शिक्षा लें।

फिर उस नैतिक उद्देश को स्पष्ट किया गया है जिसके लिए मुसलमानों को यह सत्य-असत्य का युद्ध छेड़ना पड़ता है और उन नैतिक गुणों को स्पष्टतः बयान किया गया है जिनसे उन्हें इस युद्ध में सफलता मिल सकी है।

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फिर बहुदेववादियों, कपटाचारियों और यहूदियों और उन लोगों को जो युद्ध में बंदी बनकर आए थे, निहायत शिक्षाप्रद ढंग से सम्बोधित किया गया।

फिर उन धन-सामग्री के संबंध में जो युद्ध में हाथ आयी थी, मुसलमानों को आदेश दिए गए हैं। फिर युद्ध और संधि से संबंधित कानून के संबंध में वे नैतिक आदेश दिए गए हैं जिनका स्पष्टीकरण इस चरण में इस्लामी आह्वान के प्रवेश करने के पश्चात् आवश्यक था।

फिर इस्लामी राज्य के विधान संबंधी कानून की कुछ धाराओं का उल्लेख किया गया है जिनसे दारुल इस्लाम (इस्लामी क्षेत्र) के सुरक्षित निवासियों की संवैधानिक हैसियत उन मुसलमानों से अलग कर दी गई है जो दारुल इस्लाम की सीमा से बाहर रहते हैं।

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