सूरह अहकाफ (46)

सूरह अहकाफ
“Al-Ahqaaf”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:35 verses
पारा:26

नाम रखने का कारण

आयत 21 के वाक्यांश “जब कि उसने अहक़ाफ़ में अपनी कौम को सावधान किया था’ से उद्धृत है।

अवतरणकाल

एक ऐतिहासिक घटना के अनुसार, जिसका उल्लेख आयत 29-32 में आया है कि, यह सूरह सन् 10 नबवी के अन्त में या सन् 11 नबवी के आरंभिक काल में अवतरित हुई। 

विषय और वार्ताएँ

सूरह का विषय काफिरों को उनकी गुमराहियों से सचेत करना है, जिनमें वे केवल यही नहीं कि ग्रस्त थे, बल्कि बड़ी हठधर्मी और गर्व और अहंकार के साथ उनपर जमे हुए थे।

उनकी दृष्टि में दुनिया की हैसियत केवल एक निरुद्देश्य खिलौने की थी और उसके अन्दर अपने आपको वे ‘अनुत्तरदायी प्राणी’ समझ रहे थे। एकेश्वरवाद का बुलावा उनके के प्रभु की वाणी है।

उनकी दृष्टि में इस्लाम के सत्य न होने का एक बड़ा प्रमाण यह विचार में असत्य था। वे कुरआन के सम्बन्ध में यह मानने को तैयार न थे कि यह जगत् था कि केवल कुछ नव-युवक, थोड़े-से निर्धन लोग और कुछ गुलाम ही उसपर ईमान लाए हैं।

वे कयामत और जीवन-मृत्यु के पश्चात् और प्रतिदान और दण्ड की बातों को मनगढन्त कहानी समझते थे। इस सूरह में संक्षिप्त रूप से इन्हीं गुमराहियों में से एक-एक का तर्कयुक्त खण्डन किया गया है और काफिरों को सावधान किया गया है कि तुम यदि कुरआन के आमंत्रण को रद्द कर दोगे तो तुम स्वयं ही अपना परिणाम बिगाड़ोगे।

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