1. इस्लामी दृष्टिकोण: कुरआन और हदीस में जुमा का उल्लेख
इस्लाम में जुमा का स्थान कितना ऊँचा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुरआन में खास तौर पर इसे लेकर एक पूरी सूरह (सूरह अल-जुमा, 62:9-10) उतरी है:
"ऐ ईमान वालों! जब जुमे के दिन नमाज़ के लिए पुकारा जाए, तो अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ भागो और ख़रीद-फ़रोख्त छोड़ दो। यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम समझो।" (कुरआन 62:9)
इसके अलावा, हदीसों में जुमा की फज़ीलत के बारे में कई अहम बातें मिलती हैं:
पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) ने फरमाया:
"सबसे बेहतरीन दिन जिस पर सूरज निकलता है, वह जुमा का दिन है। इसी दिन आदम (अ.) को पैदा किया गया, इसी दिन उन्हें जन्नत में दाखिल किया गया, और इसी दिन उन्हें जन्नत से निकाला गया। और क़यामत भी इसी दिन आएगी।" (सहीह मुस्लिम 854)
एक और हदीस में पैगंबर (ﷺ) ने फरमाया:
"जो आदमी जुमा के दिन ग़ुस्ल करता है, मस्जिद जल्दी जाता है, इमाम के करीब बैठता है और ध्यान से खुत्बा सुनता है, तो उसके पिछले हफ्ते के गुनाह माफ कर दिए जाते हैं।" (सहीह बुखारी 883, सहीह मुस्लिम 857)
इन हदीसों से यह स्पष्ट होता है कि जुमा का दिन मुसलमानों के लिए बहुत अहमियत रखता है।
2. जुमा की खासियत (Friday as a Special Day)
इस्लाम में जुमा को हफ्ते के सबसे महत्वपूर्ण दिन के रूप में देखा जाता है। इसकी खासियत को कुछ प्रमुख कारणों से समझा जा सकता है:
यह हफ्ते का सबसे मुबारक दिन है।
इसी दिन हज़रत आदम (अ.) की पैदाइश हुई थी।
इसी दिन क़यामत आएगी।
इस दिन दुआएं ज्यादा क़बूल होती हैं।
इस दिन की नमाज़ बाकी दिनों से ज्यादा अहमियत रखती है।
3. जुमा की नमाज़ का महत्व (Importance of Jumu'ah Prayer)
जुमा की नमाज़ मुसलमानों के लिए अनिवार्य (वाजिब) है। यह एक सामूहिक इबादत है जो हर मर्द मुसलमान को मस्जिद में जाकर अदा करनी होती है।
जुमा की नमाज़ दो रकात होती है और इससे पहले इमाम द्वारा एक खास खुत्बा (उपदेश) दिया जाता है।
पैगंबर (ﷺ) ने फरमाया: "जो व्यक्ति बिना किसी वाजिब कारण के तीन जुमा छोड़ देता है, अल्लाह उसके दिल पर मुहर लगा देता है।" (अहमद, तिर्मिज़ी, अबू दाऊद)
यह नमाज़ समाज में भाईचारे को मजबूत करती है और इस्लामी शिक्षाओं को लोगों तक पहुँचाने का जरिया बनती है।
4. जुमा के दिन की खास इबादतें (Special Worships on Jumu'ah)
इस दिन मुसलमानों को कुछ खास अमल करने की हिदायत दी गई है:
✅ 1. ग़ुस्ल (स्नान) करना
पैगंबर (ﷺ) ने फरमाया: "हर मुसलमान पर जुमा के दिन ग़ुस्ल करना वाजिब है।" (सहीह बुखारी 877)
✅ 2. अच्छे कपड़े पहनना और इत्र लगाना
पैगंबर (ﷺ) ने इस दिन स्वच्छता और अच्छी खुशबू अपनाने की ताकीद की है।
✅ 3. सूरह अल-कहफ की तिलावत करना
हदीस में आता है कि जो व्यक्ति जुमा के दिन सूरह अल-कहफ पढ़ता है, उसे पूरे हफ्ते रोशनी (नूर) हासिल होती है।
✅ 4. दुरूद शरीफ ज्यादा से ज्यादा पढ़ना
रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया: "जुमा के दिन مجھ پر زیادہ سے زیادہ درود भेजو, क्योंकि यह दिन खास है और तुम्हारा दरूद मुझ तक पहुंचाया जाता है।" (अबू दाऊद 1531)
✅ 5. दुआ क़बूल होने का खास वक्त
हदीस में आता है कि जुमा के दिन एक ऐसा वक्त होता है जब कोई भी मुसलमान सच्चे दिल से दुआ करता है, तो अल्लाह उसे कबूल कर लेता है। यह वक्त असर और मगरिब के बीच माना जाता है।
5. सामाजिक और आध्यात्मिक लाभ (Social & Spiritual Benefits)
मुसलमानों के बीच एकता बढ़ती है।
इस्लामी शिक्षाओं को जानने और समझने का अवसर मिलता है।
सामाजिक मुद्दों पर मस्जिद में चर्चा होती है।
मुसलमानों को हफ्ते में कम से कम एक बार इकट्ठा होने का मौका मिलता है।
6. जुमा से जुड़ी आम गलतफहमियाँ (Common Misconceptions)
❌ गलतफहमी: "जुमा की नमाज़ न पढ़ने से कोई गुनाह नहीं होता।"
✅ सच्चाई: तीन जुमा लगातार छोड़ने से दिल पर मुहर लग जाती है और यह गुनाहे-कबीराह (बड़ा गुनाह) है।
❌ गलतफहमी: "औरतों पर जुमा की नमाज़ वाजिब है।"
✅ सच्चाई: इस्लाम में औरतों पर जुमा की नमाज़ अनिवार्य नहीं है, लेकिन वे चाहें तो मस्जिद में जाकर इसे पढ़ सकती हैं।
❌ गलतफहमी: "जुमा के दिन कारोबार और काम छोड़ना ज़रूरी है।"
✅ सच्चाई: केवल नमाज़ के वक्त कारोबार छोड़ना जरूरी है, बाकी समय कारोबार किया जा सकता है।
जुमा का दिन मुसलमानों के लिए बेहद खास और फज़ीलत भरा है। यह दिन अल्लाह की रहमतें और बरकतें लेकर आता है। इस दिन की नमाज़, इबादतें और नेक अमल हमारी ज़िन्दगी को बरकतों से भर सकते हैं।
हमें चाहिए कि इस दिन को हल्के में न लें, जुमा की नमाज़ की पाबंदी करें, अल्लाह की याद में समय बिताएँ और ज्यादा से ज्यादा दुआ करें। अल्लाह हमें जुमा की अहमियत समझने और इस दिन की बरकतें हासिल करने की तौफीक़ दे। आमीन!