बीमार व्यक्ति रोज़ा न रखे तो उसके लिए क्या हुक्म है?

बीमार व्यक्ति रोज़ा न रखे तो उसके लिए क्या हुक्म है?

रमज़ान इस्लाम का पवित्र महीना है, जिसमें रोज़ा रखना हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है। यह सिर्फ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि आत्म-संयम, इबादत और अल्लाह के करीब जाने का जरिया है। लेकिन कई बार कुछ हालात ऐसे होते हैं जब किसी को रोज़ा न रखने की छूट दी जाती है। बीमार व्यक्ति भी उन्हीं में से एक है। सवाल यह उठता है कि अगर कोई बीमार है और वह रोज़ा नहीं रख पाता तो इस्लाम में उसके लिए क्या हुक्म है? क्या उसे बाद में रोज़े की क़ज़ा करनी होगी या फिद्या देनी होगी? आइए इस्लामिक शिक्षाओं के अनुसार इसे समझते हैं।

रोज़े की अनिवार्यता और बीमारी

इस्लाम में रोज़ा हर उस मुसलमान पर फ़र्ज़ है जो शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम हो। अल्लाह तआला ने कुरआन में फरमाया:

"रमज़ान का महीना वह है जिसमें कुरआन उतारा गया, लोगों के लिए मार्गदर्शन और सच्चाई को स्पष्ट करने वाला। इसलिए तुम में से जो इस महीने को पाए, वह रोज़ा रखे। और जो बीमार हो या सफर में हो, तो उतने ही दिनों की गिनती पूरी करे (बाद में)। अल्लाह तुम्हारे लिए आसानी चाहता है, कठिनाई नहीं।" (सूरह अल-बक़रा: 185)

इस आयत से साफ़ जाहिर होता है कि अगर कोई बीमार हो और रोज़ा रखने से उसकी तकलीफ बढ़ सकती हो या वह ठीक न हो पाए, तो इस्लाम उसे सहूलत देता है कि वह रोज़ा न रखे और बाद में उसकी क़ज़ा कर ले।

बीमार व्यक्ति के लिए छूट

इस्लाम एक रहमत भरा मज़हब है और इसमें इंसान की सहूलत को प्राथमिकता दी गई है। अगर कोई व्यक्ति बीमार है और रोज़ा रखने से उसकी बीमारी बढ़ने का खतरा है, तो उसके लिए रोज़ा छोड़ने की इजाज़त है।

किन बीमारियों में रोज़ा छोड़ने की छूट है?

1. अगर रोज़ा रखने से बीमारी बढ़ सकती हो – जैसे कि डॉक्टर की राय हो कि रोज़ा रखने से मरीज की हालत खराब हो सकती है।

2. अगर रोज़ा रखने से ठीक होने में देरी हो सकती हो – जैसे कि किसी को वायरल इंफेक्शन हो और रोज़ा रखने से कमजोरी बढ़ जाए।

3. अगर कोई गंभीर बीमारी हो – जैसे कि डायबिटीज, हृदय रोग, किडनी की समस्या, कैंसर आदि, जिनमें दवा लेना जरूरी होता है।

4. अगर व्यक्ति इतना कमजोर हो कि रोज़ा रखना मुश्किल हो – बूढ़े और कमजोर लोग जो रोज़ा रखने में असमर्थ हों।

रोज़ा न रखने की भरपाई (क़ज़ा या फिद्या?)

अगर कोई बीमार व्यक्ति रोज़ा नहीं रख पाता, तो उसके लिए दो तरह की स्थिति होती है:

1. अगर बीमारी अस्थायी (Temporary) है

जब व्यक्ति ठीक हो जाए, तो वह बाद में छोड़े हुए रोज़ों की क़ज़ा (बदले में रखना) करेगा।

जैसे कि किसी को बुखार हो गया और वह कुछ दिनों तक रोज़ा नहीं रख सका, तो वह बाद में इन दिनों के बदले रोज़े रख सकता है।

2. अगर बीमारी स्थायी (Permanent) है

अगर कोई ऐसा मरीज है जो कभी रोज़ा नहीं रख सकता (जैसे बुजुर्ग व्यक्ति या गंभीर बीमारी से पीड़ित), तो उसके लिए फिद्या देना वाजिब है।

फिद्या का मतलब है कि हर रोज़े के बदले एक गरीब को खाना खिलाना या उसकी ज़रूरत पूरी करना।

फिद्या की मात्रा आमतौर पर एक रोज़े के बदले एक व्यक्ति का दो वक्त का खाना (या उसका मूल्य) होती है।

हदीस:

नबी करीम ﷺ ने फरमाया:

"अल्लाह तआला ने मुसाफिर से रोज़े और नमाज़ का आधा हिस्सा माफ कर दिया है और बुजुर्ग व कमजोर लोगों से रोज़ा माफ कर दिया है।" (अबू दाऊद)

आम गलतफहमियां

1. हल्की बीमारी में रोज़ा छोड़ना – अगर कोई छोटी-मोटी परेशानी (जैसे सिरदर्द, हल्का जुकाम) हो और रोज़ा रखा जा सकता हो, तो उसे रखना चाहिए।

2. बिना जरूरत के रोज़ा छोड़ देना – अगर कोई बिना किसी वास्तविक बीमारी के रोज़ा छोड़ता है, तो यह सही नहीं है और इसकी भरपाई भी जरूरी है।

3. दवा लेने के लिए रोज़ा छोड़ना – अगर कोई ऐसी बीमारी है जिसमें दिन में दवा लेना जरूरी है, तो रोज़ा छोड़ा जा सकता है। लेकिन अगर दवा सुब्ह-सुबह या रात में ली जा सकती है, तो रोज़ा रखना चाहिए।

इस्लामी नजरिया और नसीहत

रोज़ा सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह की बंदगी और आत्मसंयम का इम्तिहान है।

बीमार व्यक्ति को अपनी सेहत का ख्याल रखना चाहिए, क्योंकि इस्लाम में आत्मा और शरीर दोनों की हिफ़ाज़त का हुक्म दिया गया है।

अगर रोज़ा न रख पाना मजबूरी है, तो शरई तरीके से उसकी भरपाई (क़ज़ा या फिद्या) करनी चाहिए।

इस्लाम सहूलत वाला धर्म है, और इसमें इंसानों के लिए आसानी रखी गई है।

बीमार व्यक्ति के लिए रोज़ा छोड़ने की इजाज़त दी गई है, लेकिन उसके बदले उसे क़ज़ा या फिद्या देना होगा, जो उसकी स्थिति पर निर्भर करता है। इस्लाम में सेहत को अहमियत दी गई है और इंसान पर बेवजह सख्ती नहीं की गई। अल्लाह ने हर आदेश के साथ रहमत और इंसाफ को रखा है। इसलिए, अगर आप या आपके परिवार में कोई बीमार हो, तो इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार सही फैसला करें और अपनी सेहत का भी ख्याल रखें। अल्लाह हम सबको सही समझ और सेहत अता फरमाए।

आमीन!

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