अगर रोज़े की नीयत रात में न की जाए तो क्या रोज़ा होगा?

अगर रोज़े की नीयत रात में न की जाए तो क्या रोज़ा होगा?

इस्लाम में रोज़ा एक महत्वपूर्ण इबादत है, जिसे अल्लाह ने हर मुसलमान पर फ़र्ज़ किया है। रोज़ा सिर्फ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि यह आत्मसंयम, अल्लाह की बंदगी और तक़वा हासिल करने का जरिया है। किसी भी इबादत को पूरा करने के लिए नीयत (इरादा) बेहद जरूरी होता है, क्योंकि नबी ﷺ ने फरमाया:

"अमल का दारोमदार नीयत पर है।" (बुखारी, मुस्लिम)

अब सवाल यह उठता है कि अगर कोई व्यक्ति रात में रोज़े की नीयत न करे, तो क्या उसका रोज़ा सही होगा? क्या नीयत के लिए जुबान से कुछ कहना जरूरी है या सिर्फ दिल में इरादा करना ही काफी है? आइए इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर इस मसले को समझते हैं।

नीयत का अर्थ और महत्व

इस्लाम में हर अमल की बुनियाद नीयत पर होती है। नीयत का मतलब होता है किसी काम को दिल से करने का पक्का इरादा। रोज़े के लिए नीयत करना इसलिए जरूरी है ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि यह रोज़ा अल्लाह के हुक्म की तामील में रखा जा रहा है, न कि किसी और कारण से।

क्या नीयत के लिए कोई दुआ पढ़ना जरूरी है?

नीयत के लिए कोई खास दुआ पढ़ना जरूरी नहीं।

सिर्फ दिल में यह पक्का इरादा कर लेना कि "मैं अल्लाह के लिए रोज़ा रख रहा हूँ" ही नीयत कहलाता है।

अगर कोई व्यक्ति सहरी के लिए उठता है और खाना खाता है, तो यह भी नीयत के बराबर है, क्योंकि उसका यह अमल रोज़े की तैयारी को दर्शाता है।

नीयत करने का सही वक्त

इस्लाम में अलग-अलग प्रकार के रोज़ों के लिए नीयत करने का समय अलग हो सकता है।

1. फर्ज़ (रमज़ान) और क़ज़ा के रोज़े

इन रोज़ों के लिए रात में नीयत करना जरूरी है, यानी फज्र से पहले नीयत हो जानी चाहिए।

अगर किसी ने फज्र के बाद नीयत की, तो उसका फर्ज़ रोज़ा सही नहीं होगा।

नबी ﷺ ने फरमाया:

"जो फज्र से पहले रोज़े की नीयत नहीं करता, उसका रोज़ा नहीं होता।" (अबू दाऊद, तिर्मिज़ी)

2. नफ़ली (स्वैच्छिक) रोज़े

नफ़ली रोज़ों में सहूलत दी गई है।

अगर किसी ने सुबह के समय तक (फज्र के बाद भी) रोज़ा रखने का इरादा कर लिया और उसने कुछ खाया-पिया नहीं, तो उसका रोज़ा सही होगा।

नबी ﷺ ने एक बार दोपहर में घर आकर पूछा:

"क्या खाने के लिए कुछ है?"

जब घरवालों ने कहा कि नहीं, तो आपने फरमाया:

"अच्छा, तो मैं आज रोज़ा रखता हूँ।" (मुस्लिम)

इससे पता चलता है कि नफ़ली रोज़े के लिए सुबह के बाद भी नीयत की जा सकती है, बशर्ते कि कुछ खाया-पिया न गया हो।

अगर रात में नीयत न की जाए तो क्या होगा?

1. रमज़ान के रोज़े के लिए

अगर किसी ने रात में नीयत नहीं की और सहरी भी नहीं की, लेकिन दिन में याद आया और रोज़े की हालत में रहा, तो उसका रोज़ा नहीं होगा।

उसे उस दिन का रोज़ा क़ज़ा (बाद में पूरा करना) करना होगा।

2. नफ़ली रोज़े के लिए

अगर सुबह के बाद नीयत की (बशर्ते कुछ खाया-पिया न हो), तो रोज़ा सही माना जाएगा।

3. अगर किसी ने सहरी कर ली लेकिन नीयत नहीं की

सहरी करना अपने आप में नीयत के बराबर है, इसलिए रोज़ा सही होगा।

आम गलतफहमियां

1. "नीयत के लिए कोई खास दुआ जरूरी है?"

नहीं, सिर्फ दिल में इरादा करना ही काफी है। हां, अगर कोई दुआ पढ़े तो अच्छी बात है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है।

2. "अगर सहरी नहीं की, तो क्या रोज़ा नहीं होगा?"

सहरी सुन्नत है, लेकिन फर्ज़ नहीं। अगर नीयत की हो और सहरी न भी की हो, तो भी रोज़ा सही होगा।

3. "अगर रोज़ा रखने के बाद याद आए कि नीयत नहीं की थी, तो क्या रोज़ा सही होगा?"

अगर यह फर्ज़ रोज़ा है और नीयत फज्र से पहले नहीं की थी, तो रोज़ा नहीं होगा और उसकी क़ज़ा करनी पड़ेगी।

लेकिन अगर यह नफ़ली रोज़ा है और फज्र के बाद नीयत की गई, तो रोज़ा सही होगा।

सही तरीका और इस्लामी नजरिया

नीयत दिल से होनी चाहिए, जुबान से कहना जरूरी नहीं।

रमज़ान के रोज़ों के लिए रात में (फज्र से पहले) नीयत करना जरूरी है।

नफ़ली रोज़ों के लिए सुबह के बाद भी नीयत की जा सकती है।

सहरी करना अपने आप में नीयत की निशानी है।

रोज़े की नीयत बेहद जरूरी है, क्योंकि बिना नीयत के रोज़ा स्वीकार नहीं होता। रमज़ान और क़ज़ा रोज़ों के लिए रात में नीयत करना अनिवार्य है, जबकि नफ़ली रोज़ों के लिए सुबह तक नीयत करने की सहूलत दी गई है। अगर कोई सहरी कर ले, लेकिन नीयत जुबान से न कहे, तो भी उसका रोज़ा सही होगा, क्योंकि असल नीयत दिल की होती है। इस्लाम में सहूलत और रहमत मौजूद है, लेकिन हमें अपनी इबादत को पूरा करने में कोताही नहीं बरतनी चाहिए।

अल्लाह तआला हमें सही समझ दे और रोज़े की बरकतों से नवाज़े। आमीन!

Post a Comment