अगर कोई जानबूझकर रोज़ा न रखे तो उसके लिए इस्लाम में क्या सज़ा है?

अगर कोई जानबूझकर रोज़ा न रखे तो उसके लिए इस्लाम में क्या सज़ा है?

रोज़ा इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है और हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है। यह सिर्फ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह की बंदगी और आत्मसंयम का इम्तिहान है। जो व्यक्ति किसी मजबूरी या बीमारी के बिना जानबूझकर रोज़ा नहीं रखता, वह गंभीर गुनाह करता है। इस्लाम में ऐसे व्यक्ति के लिए कड़ी चेतावनी दी गई है और उसे अपने किए पर तौबा करनी चाहिए। इस लेख में हम देखेंगे कि इस्लाम में रोज़े की क्या अहमियत है, जानबूझकर रोज़ा न रखने का क्या हुक्म है और उसकी क्या सज़ा बताई गई है।

रोज़े की अनिवार्यता

रमज़ान के रोज़े हर बालिग़, समझदार, और स्वस्थ मुसलमान पुरुष व महिला पर फ़र्ज़ हैं। अल्लाह तआला ने कुरआन में फरमाया:

"रमज़ान का महीना वह है जिसमें कुरआन उतारा गया, लोगों के लिए मार्गदर्शन और सच्चाई को स्पष्ट करने वाला। इसलिए तुम में से जो इस महीने को पाए, वह रोज़ा रखे..." (सूरह अल-बक़रा: 185)

रोज़ा छोड़ना हल्की बात नहीं है, बल्कि यह अल्लाह के हुक्म की अवहेलना है।

जानबूझकर रोज़ा न रखने का हुक्म

अगर कोई व्यक्ति बिना किसी सही वजह (बीमारी, सफर आदि) के जानबूझकर रोज़ा नहीं रखता, तो यह गुनाह-ए-कबीर (बड़ा गुनाह) माना जाता है। हदीस में आता है:

"जो व्यक्ति बिना किसी कारण (मजबूरी) के रमज़ान का एक रोज़ा भी छोड़ दे, तो अगर वह जिंदगीभर रोज़े भी रखे, तो वह उस एक रोज़े की भरपाई नहीं कर सकता।" (तिर्मिज़ी, अबू दाऊद)

यह हदीस बताती है कि रमज़ान का रोज़ा छोड़ना कितना गंभीर गुनाह है।

जानबूझकर रोज़ा छोड़ने की सज़ा

इस्लामिक शरीअत में जानबूझकर रोज़ा छोड़ने वाले के लिए दो मुख्य सज़ाएँ बताई गई हैं:

1. क़ज़ा (छोड़े गए रोज़े की भरपाई)

अगर कोई शख्स बिना सही वजह के रोज़ा नहीं रखता, तो उसे बाद में उस रोज़े की क़ज़ा करनी होगी (यानी जितने रोज़े छोड़े, उतने रोज़े बाद में रखने होंगे)।

2. कफ्फारा (प्रायश्चित)

अगर कोई व्यक्ति रमज़ान में जानबूझकर रोज़ा तोड़ देता है (बग़ैर किसी मजबूरी के), तो उसके लिए कफ्फारा वाजिब है। कफ्फारा के तीन तरीके बताए गए हैं:

1. लगातार 60 दिन रोज़े रखना – अगर कोई व्यक्ति बिना किसी इस्लामिक कारण के जानबूझकर रोज़ा तोड़ता है, तो उसे लगातार 60 दिन रोज़े रखने होंगे।

2. अगर 60 रोज़े न रख सके, तो 60 गरीबों को खाना खिलाना – अगर किसी को 60 दिन रोज़े रखने की शारीरिक शक्ति न हो, तो उसे 60 गरीबों को दो वक्त का खाना खिलाना होगा।

3. गुलाम आज़ाद करना – (यह हुक्म पुराने जमाने में था, जब गुलामी प्रथा थी, आज के दौर में यह लागू नहीं होता)।

हदीस:

"जो शख्स रमज़ान में रोज़ा तोड़ दे, उसे या तो 60 रोज़े लगातार रखने होंगे, या 60 गरीबों को खाना खिलाना होगा।" (मुस्लिम)

आम गलतफहमियां

1. "अगर रोज़ा नहीं रखा, तो बाद में रख लेंगे" – यह सोच बिल्कुल गलत है। जानबूझकर रोज़ा छोड़ना गुनाह है और इसका हल्का लेना इंसान को अल्लाह की रहमत से दूर कर सकता है।

2. "माफी मांगने से सब माफ हो जाएगा" – इस्लाम में तौबा के साथ-साथ क़ज़ा और कफ्फारा भी जरूरी है।

3. "रोज़ा छोड़ने और रोज़ा तोड़ने में कोई फर्क नहीं" – रोज़ा न रखने और जानबूझकर तोड़ने में फर्क है। न रखने पर सिर्फ क़ज़ा जरूरी है, लेकिन तोड़ने पर कफ्फारा भी जरूरी हो जाता है।

तौबा और अल्लाह की रहमत

अगर कोई व्यक्ति अज्ञानता, लापरवाही, या बुरी सोहबत की वजह से रोज़े नहीं रखता था और अब पछतावा है, तो उसे सच्चे दिल से तौबा करनी चाहिए।

तौबा के तीन मुख्य हिस्से होते हैं:

1. गुनाह को स्वीकार करना और अल्लाह से सच्चे दिल से माफी मांगना

2. फिर से गुनाह न करने का पक्का इरादा करना

3. जो रोज़े छोड़े हैं, उनकी क़ज़ा पूरी करना और अगर जरूरी हो तो कफ्फारा अदा करना

हदीस:

"अल्लाह अपने बंदे की तौबा से इतना खुश होता है जितना कोई इंसान अपने खोए हुए ऊंट को रेगिस्तान में पाकर खुश होता है।" (बुखारी, मुस्लिम)

इसका मतलब है कि अगर कोई इंसान सच्चे दिल से तौबा कर ले, तो अल्लाह उसे माफ कर सकता है।

रोज़ा इस्लाम का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे जानबूझकर छोड़ना बहुत बड़ा गुनाह है। शरीअत में ऐसे व्यक्ति के लिए कड़ी चेतावनी और सज़ा का प्रावधान है। अगर कोई व्यक्ति मजबूरी के बिना रोज़ा नहीं रखता, तो उसे क़ज़ा करनी होगी, और अगर जानबूझकर रोज़ा तोड़ता है, तो कफ्फारा भी जरूरी होगा। हालांकि, अल्लाह की रहमत बहुत बड़ी है और सच्चे दिल से तौबा करने वाले के लिए माफी के दरवाजे हमेशा खुले हैं।

अल्लाह हम सबको रोज़े की अहमियत समझने और इसे पूरी ईमानदारी से अदा करने की तौफीक़ अता फरमाए। आमीन!

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