दुनिया तरक्की की मंज़िलें तय करती हुई ज्ञान और सभ्यता के दौर में दाखिल हो चुकी थी, परन्तु लोग एकेश्वरवाद की शिक्षा को भूले हुए थे। उन्होंने एक ईश्वर के बदले अनेक ईश्वर बना लिए थे और बुतों को पूजने लगे थे। अरब के पूर्व में बसे ईरानी आग की पूजा करते थे। चीन और जापान में बौद्ध मत के मानने वाले अपने धर्म के संस्थापक को ही पूजने लगे थे।
यूरोपीय देशों में ईसाई धर्म के मानने वाले हज़रत ईसा (अलै0) को ईश्वर और ईश्वर का बेटा मान कर उनके बुत को पूजने लगे थे। यहूदी भी अपने धर्म की शिक्षाओं को भुला चुके थे।
स्वयं अरब के लोग जानवरों का जीवन व्यतीत कर रहे थे। कबीलों में बँटे हुए, लूट-पाट और मार-पीट जिनका पेशा था, वे शिक्षा से दूर थे। लड़कियों को ज़िन्दा दफन कर देते थे। ईश्वर के पैग़म्बरं हज़रत इब्राहीम (अलै0) और हज़रत इस्माइल (अलै0) ने मक्का में काबा का निर्माण इस उद्देश्य से किया था कि उसमें केवल एक ईश्वर की उपासना हो और वह सारी दुनिया के लिए एकेश्वरवाद का केंद्र बने, मगर अफसोस कि उसी काबा में तीन सौ साठ बुतों की पूजा होने लगी थी।
इन तमाम खराबियों के बावजूद अरब के लोग के बहादुर, निडर, दानशील, वादे के पक्के, आजादी पसंद और सादगी पसंद थे। उनकी भाषा ‘अरबी’ दुनिया की सर्वश्रेष्ठ और पूर्ण भाषा थी, बल्कि वे अन्य कौमों को ‘अजमी’ यानी गूंगा कहते थे। उच्च विचारों को व्यक्त करने और दिलों पर प्रभाव डालने के लिए अरबी से अधिक कोई भाषा उपयुक्त नहीं थी।
उपरोक्त परिस्थितियाँ इस बात की अपेक्षा कर रही थीं कि मानव को विनाश से बचाने के लिए फिर एक मार्गदर्शक भेजा जाए जो उन्हें इन विकृतियों से निकाल सीधा-सच्चा ईश्वरीय मार्ग दिखा सके।
ईसाई यहूदी और दुनिया की अन्य कौमें अपने धर्म ग्रंथों की भविष्यवाणियों के अनुसार एक आखिरी पैग़म्बर का इंतिज़ार भी कर रही थीं। इस महान कार्य के लिए अरब ही सब से अधिक उपयुक्त स्थान था।
हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) का जन्म
हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) का जन्म अरब के मशहूर कबीले कुरैश और शहर मक्का में हुआ। आप के जन्म के पूर्व ही आप के पिता हज़रत अब्दुल्लाह का देहांत हो चुका था और जब आप छः वर्ष के थे तो माँ हज़रत आमिना (रजि0) का भी देहांत हो गया।
फिर दो साल के बाद आप के दादा अब्दुल मुत्तलिब भी चल बसे। ऐसे में आप के चचा अबू तालिब ने आप की परवरिश की ज़िम्मेदारी ली।
मक्का की ज़िन्दगी
हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) शुरू ही से हर किस्म की बुरी बातों से दूर रहे। शराब, जुआ एंव बुतपरस्ती से भी स्वयं को बचाए रखा। आप हमेशा सच बोलते, इसीलिए लोग आप को ‘सादिक’ अर्थात् सत्यवादी कहते। आप अमानतदार थे, अतः लोग ‘अमीन’ अर्थात् अमानतदार कहते थे और अपनी अमानतें आप के पास रखते थे।
उस ज़माने में अरब में पढ़ने-लिखने का रिवाज न होने के कारण आप पढ़-लिख नहीं सके। उनके कबीले का मुख्य पेशा व्यापार था फलतः बड़े हो कर आप ने अपने चचा के साथ शाम (सीरिया) और यमन के दूर-दराज़ देशों की व्यापारिक यात्रा की।
मक्का की एक नेक इज़्ज़तदार विधवा स्त्री ख़दीजा (रज़ि०) से आप का विवाह हुआ। विवाह के समय आप की आयु पचीस वर्ष और हज़रत ख़दीजा (रज़ि०) की आयु चालीस वर्ष थी।
नुबूवत और कुरान का अवतरण
अरब में व्याप्त बुराइयों से स्वयं को बचाए रखने, चिन्तन-मनन और ईश्वर की उपासना के लिए हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) मक्का के निकट एक पहाड़ पर ‘हिरा’ नामक गुफा में चले जाते।
वहाँ वे कई-कई दिनों तक रहते। चालीस वर्ष की आयु में इसी गुफ़ा में एक दिन ईश्वर ने अपने फ़रिश्ते जिबरील (अलै0) के माध्यम से आप को बताया कि ईश्वर का सन्देश पहुंचाने के लिए आप को पैग़म्बर बनाया गया है।
इसी स्थान पर पहली ‘वही‘ (अल्लाह के चुने हुए व्यक्तियों अर्थात नबियों (पैग़म्बरों) को जो बात भेजी जाती उसे वही या वह्य (वह् य) कहते हैं) के साथ कुरान का अवतरण प्रारंभ हुआ।
फरिश्ते ने कहाः “पढ़ो” आप ने कहाः “मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ।” फ़रिश्ते ने आप को बार-बार पढ़ने को कहा और आप ने कहा कि “मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ।” तीसरी बार फरिश्तें ने कहाः “अपने रब के नाम से पढ़, जिसने इन्सान को जमे हुए ख़ून से पैदा किया। पढ़, और तेरा ‘रब’ बड़ा महान है, जिसने कलम के द्वारा सिखाया और मनुष्य को वह कुछ सिखाया जो वह नहीं जानता था।” (कुरान- 96:1-5) यह थी सबसे पहली वह्य।
इसके साथ ही कुरान के अवतरण का सिलसिला आरंभ हो गया। समय-समय पर कुरान का अवतरण होता रहा और आप (सल्ल0) लोगों तक ईश्वर का संदेश पहुंचाते रहे।
सर्वप्रथम नबी (सल्ल0) ने अपने घर वालों और मित्रों तक इस्लाम का पैग़ाम पहुंचाया और कहाः “बुतों की पूजा छोड़ कर एक ईश्वर की उपासना और बंदगी करो, उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं और मैं ईश्वर का दूत हूँ।” आप (सल्ल0) की पत्नी हज़रत ख़दीजा (रजि0) को आप (सल्ल0) की सच्चाई पर इतना भरोसा था कि वे आप पर ईमान ले आए और तुरन्त इस्लाम कुबूल कर लिया।
आप (सल्ल0) इसी प्रकार ख़ामोशी से तीन वर्ष तक इस्लाम का प्रचार करते रहे। फलस्वरूप लगभग चालीस व्यक्तियों ने इस्लाम कबूल कर लिया।
कुरैश का विरोध
ईश्वर के आदेश पर आप (सल्ल0) ने एक दिन मक्का वासियों को जमा कर के उनसे पूछा कि तुम मुझे सच्चा मानते हो या झूठा? लोगों ने कहाः “हम आप को अच्छी तरह जानते हैं कि आप एक सच्चे आदमी हैं और हम ने आप से कभी झूठी बात नहीं सुनी।”
आप ने कहाः कि यदि ऐसा है तो मेरी बात मानो, मुझे ईश्वर ने अपना पैग़म्बर नियुक्त किया है। तुम लोग एक ईश्वर को मानो और बुतपरस्ती छोड़ दो। किन्तु लोगों ने आप को सच्चा मानने के बाद भी आप को ईश्वर का पैग़म्बर मानने और एक ईश्वर की उपासना और बन्दगी करने से इन्कार कर दिया।
इन्कार करने वाले को अरबी में ‘काफिर’ कहते हैं और मानने तथा आज्ञापालन करने वाले को मुस्लिम (मुसलमान) । अतः मानने वाले ‘मुसलमान’ और इन्कार करने वाले ‘काफिर’ कहलाए।
इसके बाद इस्लाम के मानने वालों और इस्लाम के विरोधियों के बीच कशमकश का दौर शुरू हो गया। हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) और मुसलमानों को तरह-तरह से सताया जाने लगा। उन पर पहाड़ ढाए गए। इस्लाम विरोधियों के जुलमो सितम और उत्पीड़न को देखते हुए आप (सल्ल0) ने कुछ मुसलमानों को मक्का छोड़ कर हब्शा देश चले जाने की इजाज़त दे दी। इन जुल्म व ज़्यादतियों के बावजूद इस्लाम फूलता-फलता रहा।
इसी दौरान मक्का के दो बहादुर, एक आप के चचा हज़रत हमज़ा (रजि0) और दूसरे हज़रत उमर (रजि0) ने इस्लाम कबूल किया जिससे मुसलमानों को बड़ा बल मिला।
ताइफ का सफ़र
मक्का वालों ने ज़ुल्म की चक्की और तेज़ कर दी जब वे आप के संदेश को सुनने और मानने पर आमादा नहीं हुए तो आप ने पैग़म्बरी के दसवें साल ताइफ जाने का फैसला किया कि शायद वहाँ के लोग इस सन्देश की कद्र करें परन्तु वहाँ के लोगों ने भी आप (सल्ल0) की बात न सुनी और पत्थरों से लहूलुहान कर दिया। दयामूर्ति हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) ताइफवालों को दुआएँ और शुभ कामनाएँ देते हुए वापिस मक्का आ गए।
मदीना में इस्लाम का प्रचार
मक्का के उत्तर में एक शहर आबाद था जिसे मदीना कहते है यह शहर पहले ‘यसरिब’ के नाम से जाना जाता था। यहाँ के लोग बड़े ही नरम दिल, खुश-अख़लाक़ और सदाचारी थे।
यहाँ बसे यहूदियों को अपनी धार्मिक पुस्तक की भविष्यवाणी के आधार पर एक नबी के आने का इंतजार था। यहूदी इस बात का वर्णन मदीना वासियों से बराबर किया करते थे।
जब इन्हें ख़बर मिली कि मक्का में एक शख्स ने नबी होने का दावा किया है तो उन्होंने सच्चाई का पता लगाने के लिए एक वफ्द (प्रतिनिधिमंडल) भेजा। आप को सच्चा पा कर उन लोगों ने तुरन्त इस्लाम कुबूल कर लिया और नबी (सल्ल0) के सामने अहद किया कि वे ईश्वर के साथ किसी को साझी नहीं करेंगे, किसी पर झूठे आरोप नहीं लगाएँगें और चोरी, ज़िना, बच्चों का कत्ल और नबी की अवज्ञा नहीं करेंगे।
इसके बाद मदीना में इस्लाम तेज़ी से फैलने लगा। अब मुसलमानों को एक ऐसी जगह मिल गई जहाँ वे पनाह ले सकते थे। कुछ दिनों के बाद नबी (सल्ल0) के आदेश पर लगभग सभी मुसलमान धीरे-धीरे मदीना चले गए ।
मदीना की ओर हिजरत
अल्लाह की ओर से हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) को भी मदीना चले जाने का हुक्म मिला। इस्लाम विरोधियों को इसकी भनक लग गई और उन्होंने एक रात आप को कत्ल करने की योजना बनाई। लोग नबी (सल्ल0) के घर के बाहर जमा हो गए कि रात में किसी समय घर में घुस कर आप को कत्ल कर दें।
प्यारे नबी (सल्ल0) घर से निकले। दुश्मन बाहर ऊंघ रहे थे और उन्हें नबी (सल्ल0) के जाने की ख़बर भी न हुई। हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) अपने मित्र हज़रत अबू बक्र (रज़ि0) के साथ तीन दिन तक एक गुफा “गारे सौर” में छिपे रहे और फिर मदीना चले गए। दुश्मन अपनी नाकामी पर सिर पीटते रह गए।
मदीने पहुंचने पर नबी (सल्ल0) का गर्मजोशी और बेहद खुशी के साथ स्वागत किया गया। हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) और मुसलमानों के मक्का छोड़ कर मदीना चले जाने की इस ऐतिहासिक घटना को ‘हिजरत’ कहा जाता है।
बद्र की लड़ाई
पहली लड़ाई ‘गजवा-ए-बद्र’ अर्थात बद्र की लड़ाई कहलाती है। यह जंग मदीना से उत्तर अस्सी मील दूरं ‘बद्र’ नामक स्थान पर हुई थी। इस लड़ाई में मात्र तीन सौ तेरह मुसलमानों ने ग्यारह सौ दुश्मनों को पराजित कर दिया था।
उहुद की लड़ाई
दूसरी लड़ाई ‘गजवा-ए-उहुद’ अर्थात उहुद की लड़ाई कहलाती है। उहुद मदीना के उत्तर में दो मील दूर स्थित पहाड़ी का नाम है जहाँ यह जंग हुई। इसमें सात सौ मुसलमनों ने तीन हज़ार दुश्मनों का मुकाबला किया।
इस लड़ाई में आप (सल्ल0) के चचा हज़रत हमज़ा (रज़ि०) शहीद हो गए और प्यारे नबी (सल्ल0) भी जख्मी हुए, परन्तु दुश्मन मदीना पर हमला करने की हिम्मत नहीं कर सके और वापस चले गए।
अहज़ाब की लड़ाई
तीसरी बड़ी लड़ाई ‘गजवा-ए-अहज़ाब’ अर्थात अहज़ाब की लड़ाई कहलाती है। इस बार मक्का के इस्लाम विरोधियों ने अरब के कई कबीलों की मदद और यहूदियों के सहयोग से मदीना का घेराव कर लिया था। शहर को बचाने के लिए मुसलमानों ने शहर में दाखिल होने वाले रास्तों पर खंदक (खाई) खोद दी थी, इसी कारण इसे ‘गजवा-ए-खंदक’ भी कहा जाता है।
सुरक्षा के इस नए तरीके के कारण दुश्मन सेना बहुत दिनों तक डेरा डाले पड़ी रही लेकिन कामयाब नहीं हो सकी। अन्ततः एक भीषण तूफान ने उनका ख़ेमा उखाड़ फेंका और वे युद्ध-सामग्री छोड़ कर भाग खड़े हुए।
सुलह हुदैबिया
अहज़ाब की लड़ाई के बाद प्यारे नबी (सल्ल0) हज के इरादे से चौदह सौ मुसलमानों के साथ मक्का की ओर रवाना हुए। इसकी सूचना पा कर इस्लाम विरोधियों ने उन्हें रोकने की योजना बनाई।
मुहम्मद (सल्ल0) ने हुदैबिया नामक स्थान पर पड़ाव डाल कर कुरैश के पास अपना दूत यह संदेश दे कर भेजा कि वे लड़ने नहीं आए हैं बल्कि हज करना चाहते हैं। परन्तु इस्लाम दुश्मनों ने उस दूत के साथ दुर्व्यवहार किया। फिर हज़रत उस्मान (रजि0) को भेजा गया।
अन्ततः इस्लाम विरोधियों और मुसलमानों के बीच ‘सुलह हुदैबिया’ के नाम से एक समझौता हुआ। इस समझौते के कारण मुसलमान और इस्लाम विरोधियों के बीच आपसी मेलजोल बढ़ा। फलतः मुसलमानों के सद्व्यवहार से प्रभावित हो कर बड़ी संख्या में लोग मुसलमान होने लगे।
ख़ैबर की लड़ाई
मदीना में बसे यहूदियों के साथ मुसलमानों का समझौता था। मुसलमान उनके साथ अच्छा व्यवहार करते थे, किन्तु यहूदी हमेशा मुसलमानों के ख़िलाफ षड्यंत्र रचते रहे। उनके षड्यंत्र के परिणाम स्वरूप ही ‘खंदक’ की लड़ाई हुई। उनसे तंग आ कर नबी (सल्ल0) ने उन यहूदियों को मदीना से निकाल दिया।
मदीना से निकल कर वे लोग ख़ैबर नामक स्थान पर बस गए। वहाँ पहुंच कर भी वे चैन से नहीं बैठे और आस-पास के कबीलों को मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध के लिए तैयार करना शुरू कर दिया। सूचना पा कर नबी (सल्ल0) ने ख़ैबर पर कार्रवाई की और उसे इस्लामी राज्य में मिला लिया।
मक्का विजय
सुलह हुदैबिया के दो साल बाद जब मक्का के लोगों ने मुसलमानों से किया समझौता तोड़ दिया तो आप (सल्ल0) ने दस हज़ार मुसलमानों को ले कर मक्का में प्रवेश किया। मुसलमानों की इतनी बड़ी संख्या देख कर विरोधियों के होश उड़ गए और उन्होंने बिना लड़े ही शहर मुसलमानों के हवाले कर दिया।
आख़िरी हज
प्यारे नबी (सल्ल0) ने हज का इरादा किया, आप के साथ एक लाख से अधिक मुसलमानों ने हज किया। प्यारे नबी (सल्ल0) ने फ़रमाया “मैं ऐलान करता हूँ कि ईश्वर के सिवा कोई उपास्य नहीं। वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं और मैं ऐलान करता हूँ कि मुहम्मद उसका बन्दा और उसका पैग़म्बर है।” मैं तुम्हारे बीच दो ऐसी चीजें छोड़ जा रहा हूँ कि जब तक उस पर चलते रहोगे कभी सत्य मार्ग से न हटोगे, वह है अल्लाह की किताब (कुरान) और मेरी सुन्नत अर्थात मेरा तरीका।
“आपने अज्ञानता के समय के समस्त विधान और तौर-तरीके ख़त्म कर दिए। ईश्वर एक है और समस्त मानव आदम (अलै0) की संतान हैं और वें सब बराबर हैं। किसी अरबी को ग़ैर-अरबी पर और ग़ैर अरबी को अरबी पर, काले को गोरे पर और गोरे को काले पर कोई श्रेष्ठता नहीं यदि किसी को श्रेष्ठता प्राप्त है तो भले कर्मों के कारण।”
इंतकाल
यही अरब जहाँ सब आप की जान के दुश्मन थे, एक दूसरे के खून के प्यासे थे, चारों ओर अशान्ति, लूट-मार, लड़ाई-झगड़ा व्याप्त था, अनगिनत बुतों की पूजा की जाती थीं, वही अरब आप (सल्ल0) के मात्र 23 वर्ष के प्रयास के बाद आप के आदेश पर जान कुरबान करने को तैयार था। चारों ओर सुख-शांति का वातावरण था और एकेश्वरवाद का बोल बाला था। आख़िरी हज के बाद नबी (सल्ल0) मदीना वापस आ गए और लगभग तीन महीने बाद आप का देहांत हुआ।