सूरह राअद (13)

सूरह राअद
“Ar-Ra’d”

कहाँ नाज़िल हुई:मदीना
आयतें:43 verses
पारा:13

नाम रखने का कारण

आयत 13 के वाक्य में “बादलों की गरज (रअद) उसकी प्रशंसा के साथ उसकी पाकी बयान करती है और फ़रिश्ते उसके भय से काँपते हुए उसकी बड़ाई तस्वीह करते हैं,” के शब्द अर्-रखुद (गरज) को इस सूरह का नाम निर्धारित किया गया है।

इस का यह अर्थ नहीं है कि इस सूरह में बादल की गरज की समस्या पर विचार व्यक्त किया गया है, बल्कि यह केवल लक्षण के रूप में यह व्यक्त करता है कि वह सूरह है जिसमें अर-रअद शब्द आया है या जिसमें रअद का उल्लेख हुआ है।

अवतरणकाल

आयत 27 से लेकर 31 और आयत 38 से लेकर 43 तक की विषय वार्ताएँ इसकी साक्षी हैं कि यह सूरह भी उसी कालखण्ड की है जिसमें सूरह 10 (यूनुस), 11 (हूद) और 7 (आराफ़) अवतरित हुई हैं अर्थात् मक्का के निवास का अन्तिम समय वर्णन-शैली से प्रत्यक्षतः स्पष्ट हो रहा है कि नबी (सल्ल. को इस्लाम की ओर आमंत्रित करते हुए एक दीर्घकाल व्यतीत हो चुका है।

विरोधी आपको पराजित करने और आपके मिशन को असफल करने के लिए तरह-तरह की चालें चलते रहे हैं, ईमान वाले बार-बार कामना कर रहे हैं कि काश कोई चमत्कार दिखा कर ही इन लोगों को सीधे रास्ते पर लाया जाए, और अल्लाह मुसलमानों को समझा रहा है कि ईमान की राह दिखाने का यह तरीका हमारे यहाँ प्रचलित नहीं है। 

और यदि सत्य के शत्रुओं को अधिक अवकाश दिया जा रहा है तो यह ऐसी बात नहीं है कि जिससे तुम घबरा उठो फिर आयत 31 से यह भी मालूम होता है कि बार-बार काफिरों (अधर्मियों) की हठधर्मी का ऐसा प्रदर्शन (हो चुका है, जिसके पश्चात् यह कहना बिल्कुल ठीक मालूम होता है कि यदि कब्रों से मुर्दे भी उठ कर आ जाएँ तब भी ये लोग न मानेंगे, बल्कि इस घटना की भी कोई न कोई व्याख्या कर डालेंगे। इन सब बातों से यही अनुमान होता है कि यह सूरह मक्का के अन्तिम कालखण्ड में अवतरित हुई होगी।

ये भी पढ़े -   सूरह अन्कबूत (29)

केन्द्रीय विषय

सूरह का अभिप्राय पहली ही आयत में प्रस्तुत कर दिया गया है, अर्थात् यह कि जो कुछ मुहम्मद (सल्ल.) पेश कर रहे हैं, वही सत्य है, किन्तु यह लोगों की गलती है कि वे उसे नहीं मानते। समस्त अभिभाषण इसी केन्द्रीय विषय के चतुर्दिश घूमता है।

Leave a Reply